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राज्य आंदोलनकारियों ने किया सम्मान समारोह का बहिष्कार

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उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने जिला प्रशासन द्वारा आयोजित सम्मान समारोह का बहिष्कार करते हुए शहीद स्थल पर जोरदार नारेबाजी के साथ प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों का कहना है कि राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी उत्तराखंड अपनी मूल अवधारणा और राज्य आंदोलन की भावना से भटक चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस आदर्श, समान विकास और पहाड़-केंद्रित नीति के लिए राज्य का निर्माण हुआ था, वह आज भी अधूरी है।

आंदोलनकारी भुवन कांडपाल ने कहा कि सरकार आंदोलनकारियों का सम्मान केवल औपचारिकता के रूप में कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी समस्याएं और राज्य हित के मुद्दे अनदेखे हैं। एक सम्मान समारोह के जरिये सरकार वोट बैंक की राजनीति नहीं कर सकती। पलायन, बेरोजगारी, जल-जंगल-जमीन की लूट और पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा जैसी समस्याएं आज भी वहीं खड़ी हैं। कांडपाल ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य आंदोलन की धुरी रही गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा भुला दिया गया है और इस निर्णय से पहाड़ फिर हाशिये पर पहुंच गए हैं।

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राज्य आंदोलनकारी हीरा बल्लभ भट्ट ने कहा कि जिन शहीदों ने प्राणों की आहुति देकर राज्य निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, उनके सपनों के अनुरूप उत्तराखंड का विकास नहीं हो सका। उत्तराखंड की आत्मा पहाड़ों में बसती है, लेकिन पहाड़ आज भीषण पलायन, वन्यजीवों के आतंक और आधारभूत सुविधाओं की कमी से त्रस्त हैं। 21वीं सदी में भी लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क तथा संचार सुविधाओं के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हैं। उन्होंने अनियोजित विकास को पहाड़ों में बढ़ती आपदाओं का मूल कारण बताया।

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वही आंदोलनकारी रमेश कृषक ने कहा कि यह समय आत्ममंथन का है। राज्य निर्माण की मूल भावना—समान विकास, रोजगार और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को वास्तविक रूप देने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। यदि उपेक्षा का यही क्रम जारी रहा। आंदोलनकारी जनता के साथ पुनः सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। उन्होंने कहा कि शहीदों के बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब राज्य विकास के बजाय संसाधनों की सुरक्षा, पहाड़ की गरिमा और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
इस अवसर पर नीमा दफौटी, गोकुल जोशी, गंगा सिंह पांगती, हंसी देवी, नंदी देवी, खष्टी, बंसती, खष्टी, राजेंद्र सिंह, दान सिंह, लीलाधर, सुंदर सिंह, गोविंद सिंह, मंगल सिंह आदि उपस्थित थे।

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