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लोक निर्माण विभाग में मशीनों को सुविधा, इंसान की उपेक्षा

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उत्तराखण्ड के लोक निर्माण विभाग में वर्ष 2000 से कार्यरत कम्प्यूटर ऑपरेटरों की स्थिति आज भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। आधुनिक तकनीक और डिजिटल व्यवस्था के इस दौर में जिन लोगों ने विभाग को कंप्यूटरीकृत करने में अहम भूमिका निभाई, वही आज सबसे अधिक उपेक्षित हैं।

यदि विभाग में खरीदे गए एक वाहन और वर्षों से कार्यरत एक कम्प्यूटर ऑपरेटर की तुलना की जाए, तो व्यवस्था की प्राथमिकताएँ साफ दिखाई देती हैं। विभागीय वाहन की नियमित सर्विस होती है, समय-समय पर मरम्मत कराई जाती है, उसके लिए ईंधन, बीमा और चालक की व्यवस्था होती है। निर्धारित समय—लगभग 15 वर्षों—के बाद उसे विधिवत रिटायर कर दिया जाता है।

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इसके विपरीत, कम्प्यूटर ऑपरेटर जो 20–25 वर्षों से निरंतर विभागीय कार्यों का भार संभाल रहे हैं, आज भी अस्थायी व्यवस्था के अंतर्गत काम करने को मजबूर हैं।
न उनके लिए निश्चित कार्य घंटे हैं,
न साप्ताहिक या वार्षिक अवकाश की स्पष्ट व्यवस्था,
न चिकित्सा सुविधा,
न सामाजिक सुरक्षा।

बीमारी, पारिवारिक संकट या मानसिक थकान—हर परिस्थिति में उनसे निरंतर कार्य की अपेक्षा की जाती है। मानो वे कर्मचारी नहीं, बल्कि ऐसी मशीन हों जिनकी न सर्विस होती है, न देखभाल।

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यह विडंबना ही है कि जिस वाहन को 15 साल बाद अनुपयोगी मान लिया जाता है, उसी विभाग में एक मानव 20 वर्षों से अधिक सेवा देने के बाद भी न नियमित होता है, न उसे सुरक्षित भविष्य का आश्वासन मिलता है।

यह स्थिति केवल विभागीय स्तर की नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की सामूहिक चुप्पी का परिणाम है। डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस की बात करने वाली सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि इस डिजिटल ढांचे को संभालने वाले लोग किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं।

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आज आवश्यकता है कि लोक निर्माण विभाग एवं राज्य सरकार संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए वर्षों से कार्यरत कम्प्यूटर ऑपरेटरों की सेवा शर्तों, नियमितीकरण, अवकाश और चिकित्सा सुविधाओं पर गंभीर निर्णय लें।

क्योंकि सवाल केवल व्यवस्था का नहीं है, सवाल यह है—
क्या एक इंसान की कीमत एक वाहन से भी कम है?

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