बागेश्वर। पांव थक गए, फाइलें घिस गईं, लेकिन समस्याएं वहीं की वहीं हैं। कुछ इसी दर्द और नाराजगी के साथ जिले के दूरस्थ गांवों से आए ग्रामीण सोमवार को जनता दरबार पहुंचे। किसी की सड़क सात साल से अधूरी है, किसी का मकान आंधी-तूफान में उजड़ गया, तो कोई गलत बिजली बिलों से परेशान है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जनता दरबार और तहसील दिवस में बार-बार गुहार लगाने के बावजूद उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहा है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे लोगों ने मीडिया के सामने अपनी पीड़ा रखी और कहा कि समस्याओं के समाधान की उम्मीद में वे वर्षों से अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं, लेकिन नतीजा शून्य है।
सात साल से सड़क का इंतजार, हर बार नया भरोसा
उखलसो के दीवान सिंह गड़िया की पीड़ा भी कुछ अलग नहीं है। उन्होंने बताया कि उखलसो-पितरूना सड़क के लिए ग्रामीण करीब सात वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। कई बार लिखित आवेदन दिए, कई बार जनता दरबार में पहुंचे, लेकिन सड़क आज भी कागजों से बाहर नहीं निकल पाई। हर बार कहा जाता है कि काम होगा, लेकिन अगली बार फिर वही जवाब मिलता है। आज भी सिर्फ आश्वासन मिला है। उनका कहना है कि स्वीकृति मिलने के वर्षों बाद भी सड़क नहीं बनी, जिससे आज भी लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
6500 रुपये में कैसे बनेगा टूटा हुआ घर?
भतोड़ा निवासी भुवन चंद्र उपाध्याय तीसरी बार अपनी समस्या लेकर जनता दरबार पहुंचे थे। आंधी-तूफान में उनका मकान क्षतिग्रस्त हो गया था। घर रहने लायक नहीं बचा है। प्रशासन ने 6500 रुपये देकर औपचारिकता पूरी कर दी। इतने पैसे में तो मकान की एक दीवार भी नहीं बन सकती। लगातार अधिकारियों के पास जा रहा हूं, लेकिन राहत के नाम पर सिर्फ कागजी कार्रवाई हो रही है। उन्होंने कहा कि परिवार असुरक्षित स्थिति में जीवन बिताने को मजबूर है और हर बार नई उम्मीद लेकर आने के बाद भी निराशा ही हाथ लगती है।
बिल भरते जाओ, बकाया बढ़ता जाए
रेखाड़ी निवासी चंचल राम बिजली विभाग की कार्यप्रणाली से नाराज नजर आए। हर महीने बिल जमा कर रहा हूं, फिर भी बकाया बढ़ता जा रहा है। कभी 20 हजार तो कभी 50 हजार रुपये का बिल आ रहा है। कई बार शिकायत की, जनता दरबार में भी आया, लेकिन समस्या जस की तस है। ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र के कई परिवारों को वास्तविक खपत से कहीं अधिक बिजली बिल भेजे जा रहे हैं, जिससे लोग मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से परेशान हैं।
इससे लोगों में यह सवाल उठने लगा है कि यदि लिखित आश्वासन और जनता दरबार भी समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे हैं, तो आम जनता आखिर अपनी बात कहां रखे। जनता दरबार से लौटते समय ग्रामीणों के चेहरों पर निराशा साफ दिखाई दी। उनका कहना था कि वे अब केवल सुनवाई नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई देखना चाहते हैं। इन सब के अलावा कई अन्य ग्रामीणों ने भी जनता दरबार में शिकायती के बाद कार्यवाही नहीं होने की बाद दोहरायी कहा कि एक ही शिकायत को लेकर वह कई बार जनता दरबार आते है पर सुनवाई के बदले मिलता है बस आश्वासन।








