बागेश्वर : कांडा क्षेत्र के विजयपुर स्थित प्रसिद्ध धौलीनाग मंदिर में अश्विन नवरात्र की पंचमी को आस्था और उत्सव का अद्भुत संगम देखने को मिला। पूरे दिन मंदिर परिसर भक्तों की भीड़ से गुलजार रहा। श्रद्धालुओं ने धौलीनाग भगवान की पूजा-अर्चना कर खीर का भोग लगाया और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया।
मेले का मुख्य आकर्षण 22 हाथ लंबी मशाल रही, जिसे स्थानीय बोली में राखा कहा जाता है। मान्यता है कि इस विशाल मशाल से मंदिर की परिक्रमा करने पर सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होता है। मड़ गांव से ग्रामीण आठ किलोमीटर पैदल चलकर चीड़ के छिलकों से बनी मशाल लेकर पहुंचे। सांझ ढलते ही जैसे ही राखा प्रज्वलित हुआ, पूरा वातावरण जय धौलीनाग के जयघोष से गूंज उठा। मशाल यात्रा में धपोलासेरा, कांडा, पोखरी, खंतोली, मिथुनकोट, विजयपुर, ढपटी, नागकन्याल, कभाटा, रिखाड़ी, गोपेश्वर, भंडारीसेरा समेत 22 गांवों के लोग शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने बारी-बारी से मशाल थामकर मंदिर की परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान देव डांगर अवतरित होकर भक्तों को आशीर्वाद देते रहे। वहीं दिनभर मंदिर प्रांगण में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने मेले की रौनक और बढ़ा दी। वहीं समिति के अध्यक्ष भवान सिंह धपोला ने बताया कि यह परम्परा 500 साल पुरानी है। जब भगवान धौलीनाग की यहां उत्पत्ति हुई थी तब जंगल में आग लगी थी। पहले कांडपाल को आवाज लगाई गई। उनके द्वारा आवाज नहीं सुनी। उसके बाद धपोला लोगों को आवाज सुनाई गई उनके द्वारा अन्य गांव वालों को भी इक्कठा किया गया। फिर वहां जाकर जंगल की आग को बुझाया गया। तब से ही यह परम्परा बनी हुई है। तब से हम हर वर्ष नवरात्रि की पंचमी को राखा लेकर यहां की परिक्रमा करते है। वहीं क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक गोविंद सिंह भंडारी ने बताया कि आदिकाल से यहां यह पूजा होती आई है। इस पूजा के दौरान हर गांव से राखा यहां पहुंचती है। भगवान धौलीनाग की यह पूजा अन्य किसी भी जगह पर नहीं होती है। यहां की परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में भी लोग इस परम्परा की जीवित रखे हुए है।








