बागेश्वर। उत्तराखंड की लोक चेतना और सांस्कृतिक पहचान के प्रणेता इंद्रमणि बडोनी की जयंती जनपद में लोक संस्कृति दिवस के रूप में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज, बागेश्वर में एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें छात्र–छात्राओं ने उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं की मनमोहक झलक प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत इंद्रमणि बडोनी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद विद्यार्थियों ने छोलिया नृत्य, झोड़ा, चांचरी, छपेली सहित विभिन्न लोकनृत्यों और लोकगीतों की प्रस्तुति दी। पारंपरिक परिधानों में सजे छात्र–छात्राओं ने मंच के माध्यम से पहाड़ की संस्कृति, रीति–रिवाज और सामाजिक जीवन को जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम समन्वयक दीप जोशी ने कहा कि इंद्रमणि बडोनी केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा थे। उन्होंने लोक संस्कृति को आंदोलन का रूप दिया और पहाड़ की पहचान को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया। आज के बच्चे जब अपनी संस्कृति को मंच पर प्रस्तुत करते हैं, तो यही बडोनी जी के विचारों की सच्ची श्रद्धांजलि है।
वृक्ष पुरुष किशन सिंह मलडा ने कहा कि इंद्रमणि बडोनी केवल एक नाम नहीं थे, वे उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू थे। जिस तरह एक वृक्ष अपनी जड़ों से जुड़कर आंधियों में भी खड़ा रहता है, उसी तरह बडोनी जी जीवन भर अपनी लोक संस्कृति, अपनी भाषा और अपने लोगों से जुड़े रहे। उन्होंने हमें सिखाया कि विकास तभी सार्थक है, जब उसमें अपनी परंपराएं सुरक्षित रहें। यदि हम अपनी लोक संस्कृति को भूल गए, तो हमारी पहचान भी सूखती हुई डालियों की तरह कमजोर हो जाएगी। बडोनी जी ने लोक संस्कृति को आंदोलन बनाया और बताया कि गीत, नृत्य और बोली केवल कला नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने की शक्ति हैं।
जन शिक्षण संस्थान के निदेशक जितेंद्र तिवारी ने अपने संबोधन में इंद्रमणि बडोनी के जीवन और योगदान पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बडोनी जी ने यह साबित किया कि लोक संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और दिशा देने की ताकत है। उन्होंने उत्तराखंड की लोक परंपराओं को बचाने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। आज जरूरत है कि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़े और लोक संस्कृति को अपनी पहचान बनाए।
विद्यार्थियों की प्रस्तुति बनी आकर्षण
कार्यक्रम में छात्रों द्वारा प्रस्तुत लोकनाट्य और समूह गीतों में पहाड़ का दर्द, संघर्ष और सौंदर्य साफ झलकता रहा। दर्शकों ने तालियों के साथ विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया। शिक्षकों ने भी इस तरह के आयोजनों को विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने वाला बताया।
सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प
कार्यक्रम के समापन पर सभी ने संकल्प लिया कि इंद्रमणि बडोनी के सपनों के उत्तराखंड को साकार करने के लिए लोक भाषा, लोक कला और लोक परंपराओं को संरक्षित और संवर्धित किया जाएगा। आयोजन ने यह संदेश दिया कि जब तक लोक संस्कृति जीवित है, तब तक उत्तराखंड की आत्मा भी जीवित रहेगी।








