कपकोट। उत्तराखंड के लोकपर्व घी संक्रांति के अवसर पर कपकोट क्षेत्र में बुधवार को पारंपरिक झोड़ा-चांचरी का आयोजन धूमधाम से किया गया। मुख्य बाजार से लेकर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक लोगों ने सामूहिक रूप से लोकगीत और चांचरी गाकर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का उत्सव मनाया।
इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने सुरीले लोकगीतों की तान छेड़ी तो हुड़के की थाप ने माहौल को कुमाऊंनी लोकसंस्कृति के रंग में रंग दिया। कर्मी, बदियाकोट, तीख, चौड़ा और भराड़ी के बमसेरा सहित विभिन्न गांवों में ग्रामीण एकजुट हुए और सामूहिक रूप से चांचरी गाकर पर्व की खुशियां मनाईं।
कार्यक्रम में शामिल लोगों ने कहा कि घी संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक परंपराओं, आस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। पारंपरिक आयोजनों की शुरुआत कुमाऊं के देवी-देवताओं के आह्वान और वंदना से की जाती है। इसके बाद लोकगीत, झोड़ा-चांचरी और हुड़के की थाप के साथ उत्सव का माहौल बनता है।
स्थानीय शिक्षक दीवान सिंह ऐठानी ने बताया कि क्षेत्र में झोड़ा-चांचरी की यह परंपरा दशकों से चली आ रही है। घी संक्रांति के अवसर पर कपकोट क्षेत्र के लोग पुरानी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने और नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से जोड़ने के उद्देश्य से एक साथ जुटते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन ग्रामीणों के बीच आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता को भी मजबूत करते हैं।
घी संक्रांति पर कपकोट के विभिन्न गांवों में हुए आयोजनों ने एक बार फिर पहाड़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं की खूबसूरत झलक पेश की। हुड़के की थाप और चांचरी के गीतों से गूंजते गांवों में पर्व का उत्साह देर तक बना रहा।








