बागेश्वर : जिले के लिए खुशी और गौरव का क्षण है। जिले के दो महानुभावों को पद्म सम्मान प्रदान करने की घोषणा की गई। कपकोट के दूरस्थ गांव सोमिला, नामतीचेटाबगड़ में गोपाल सिंह कोश्यारी और मोतिमा देवी के घर जन्म लेने वाले भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण सम्मान मिलने की घोषणा के बाद पूरा जिला गौरवान्वित है। भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून 1942 को हुआ था। कोश्यारी की भतीजी छाया कोश्यारी ने बताया कि उनके दादा की पहले आठ बेटियां हुई थी। दादी ने पुत्र होने की कामना के लिए कई मंदिरों में मनौती मांगी। नौवें नंबर पर भगत सिंह कोश्यारी का जन्म हुआ। बाद में उनके दो भाई जगत सिंह कोश्यारी और नंदन कोश्यारी हुए। बचपन से ही कोश्यारी को शिक्षा ग्रहण करने का शौक था। परिवार की माली हालत बेहतर नहीं होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा ग्रहण करने को प्राथमिकता दी। इसी पढ़ाई की बदौलत वह सफलता प्राप्त करते गए। हालांकि सफलता के बीच भी गांव उनके मन में बसा रहा। आज भी वह गांव में एक सामान्य ग्रामीण की तरह ही आना पसंद करते हैं। कोश्यारी
को पद्मभूषण मिलने पर परिवार वाले बेहद खुश हैं।
वर्ष 2000 में उत्तराखंड के अलग अलग प्रदेश बनने के बाद उन्हें प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली। पहले विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल 30 अक्तूबर 2001 से एक मार्च 2002 तक रहा। 2002 में विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद का 2002 से 2007 तक विधानसभा में नेता विपक्ष के पद पर रहे। 2007 से 2009 तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। 2008 से 2014 तक उत्तराखंड में राज्यसभा के सदस्य रहे। 2014 में नैनीताल संसदीय सीट से चुनाव जीतकर पहली बर लोकसभा सदस्य बने। पांच सितंबर 2019 से 12 फरवरी 2023 तक वह महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे।

कैलाश पंत को पद्मश्री मिलने से खंतोली में जश्न
कांडा तहसील क्षेत्र के खंतोली गांव के मूल निवासी कैलाश चंद्र पंत को पद्मश्री सम्मान मिला है। वर्तमान में मध्य प्रदेश के मह में रहने वाले पंत को पद्म सम्मान मिलने से क्षेत्र में खुशी की लहर है।
उनको उपलब्धि पर ग्रामीणों ने गांव में मिठाई बांटकर जरन मनाया। खंतीली के तलला गांव के मूल निवासी कैलाश चंद्र पंत का जन्म 26 अप्रैल 1936 को इंदौर के मह में हुआ था।
उनका पूरा परिवार उनके जन्म से पहले ही गांव छोड़ गया था। हालांकि गांव से उनका लगाव बना रहा। 20 साल पहले तक कैलाश पंत अपने परिवार के साथ समय-समय पर गांव आते रहते थे। उनकी पुत्री प्रीति जोशी ने बताया कि उनके दादा लोग तीन भाई थे, तीनों मध्य प्रदेश में शिफ्ट हो गए थे। अंतिम बार वह 2006 में धौलीनाग मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए गांव आए थे।
उम्र बढ़ने के कारण बाद में उनका गांव आना छूट गया, लेकिन गांव से आज भी उनका लगाव बना हुआ है। रविवार को उन्हें पद्मश्री मिलने की सूचना मिलते ही उनकी बिरादरी के लोगों ने खुशी मनानी शुरू कर दी।
साम को गांव में मिठाई बांटी गई। इस मौके पर दामोदर पंत, चंद्रप्रकाश पंत, मोहन पंत, संध्या पंत गिरीश पंत, विनोद पंत, महेश पंत, प्रभाकर पंत, सुशीला पंत, भगवती पंत समेत तमाम ग्रामीण मौजूद रहे।








