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जनता की आवाज़ या सत्ता की प्रतिध्वनि: मीडिया की बदलती पहचान

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लोकतंत्र और पत्रकारिता के बीच बढ़ती दूरी

एक समय था जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। इसका उद्देश्य केवल समाचारों को रिपोर्ट करना नहीं था, बल्कि सत्ता की निगरानी करना, नीति निर्धारण पर सवाल उठाना और आम जनता की आवाज़ को मंच प्रदान करना था। पत्रकार का कार्य जनता और सरकार के बीच पुल का होता था, जहां वह दोनों पक्षों को जोड़ते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता था। हालांकि बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता के स्वरूप में तेजी से परिवर्तन देखा गया है। बदलते आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में मीडिया का बड़ा हिस्सा आज सत्ता के अधिक करीब दिखाई दे रहा है। यह समीपता कई बार पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उद्देश्य को प्रभावित करती है। वर्तमान समय में अनेक समाचार माध्यमों में सत्ता की आलोचना की जगह उसकी निरंतर प्रशंसा का चलन बढ़ गया है। समाचार प्रस्तुत करने का स्वरूप भी इस प्रकार बदल गया है कि उसमें नीतियों की विवेचना की अपेक्षा प्रचार की झलक अधिक दिखती है। यह स्थिति तब और भी जटिल हो जाती है जब पत्रकार सत्ता से असहमति जताने के स्थान पर उसकी प्रवक्ता की भूमिका निभाते नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र की आवश्यक विशेषता जवाबदेही कमजोर होती है।हालांकि मीडिया संस्थानों का वित्तीय ढांचा भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब अधिकांश समाचार चैनल और अखबार विज्ञापनों पर निर्भर हो जाते हैं, तो संपादकीय निर्णय स्वतंत्र नहीं रह पाते। यदि किसी समाचार संगठन को राजकीय या कॉरपोरेट विज्ञापन की बड़ी राशि प्राप्त हो रही है, तो उसके लिए आलोचनात्मक पत्रकारिता को बनाए रखना कठिन होता है। यह स्थिति पत्रकार और पाठक के बीच विश्वास को नुकसान पहुँचाती है। वही इन परिस्थितियों में स्वतंत्र मीडिया पोर्टल, स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल माध्यमों ने वैकल्पिक रास्ता अपनाया है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और स्वतंत्र समाचार वेबसाइट्स के माध्यम से अनेक पत्रकार अब सत्ता से कठिन प्रश्न पूछने का साहस कर रहे हैं। हालांकि इनके सामने संसाधनों और सुरक्षा दोनों की चुनौतियाँ हैं। बावजूद इसके, ये आवाज़ें लोकतंत्र के लिए आशा की एक मजबूत किरण बनकर सामने आई हैं। मेरा मानना है कि मीडिया का भविष्य न केवल संस्थानों पर बल्कि पाठक और दर्शकों की चेतना पर भी निर्भर करता है। दर्शकों और पाठकों को भी यह तय करना होगा कि वे कैसी पत्रकारिता का समर्थन करते हैं – वह जो सवाल करती है या वह जो सिर्फ समर्थन करती है। यदि समाज जागरूक और संवेदनशील रहेगा तो मीडिया भी अपने मूल कर्तव्यों की ओर लौटेगा। पत्रकारिता केवल खबरों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा की आवाज़ होती है। जब यह आवाज़ निष्पक्ष, निर्भीक और उत्तरदायी होती है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। वर्तमान दौर में जरूरत है कि मीडिया अपने मूल्यों की ओर लौटे, और सत्ता के निकट नहीं बल्कि जनता के साथ खड़ा हो। पत्रकारों, संस्थानों और दर्शकों तीनों को मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाना होगा।

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जगदीश उपाध्याय
बागेश्वर

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