बागेश्वर : विशेष सत्र न्यायाधीश पंकज तोमर की अदालत ने नाबालिग भांजी से दुष्कर्म के बहुचर्चित मामले में उसके सगे मामा को दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास और दो लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना अदा नहीं करने पर दोषी को छह माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। न्यायालय ने जुर्माने की राशि में से एक लाख 75 हजार रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में देने के आदेश दिए हैं। साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि विचारण के दौरान आरोपित द्वारा जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
अभियोजन के अनुसार पीड़िता बचपन से अपने नाना-नानी के घर रह रही थी। वर्ष 2024 में पेट दर्द की शिकायत होने पर परिजन उसे अस्पताल ले गए, जहां जांच में उसके तीन माह की गर्भवती होने का पता चला। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और पोक्सो अधिनियम समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विवेचना शुरू की गई। शुरुआत में पीड़िता ने घटना के संबंध में अन्य व्यक्तियों के नाम लिए थे, लेकिन बाद में बाल कल्याण समिति की काउंसलिंग और न्यायालय में दर्ज कराए गए अपने बयान में उसने बताया कि उसके सगे मामा ने उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। उसने यह भी कहा कि आरोपित ने ही उसे दूसरे लोगों का नाम लेने के लिए दबाव बनाया था। विवेचना के दौरान पुलिस ने पीड़िता, आरोपित और गर्भस्थ भ्रूण के डीएनए नमूने लेकर फोरेंसिक जांच कराई। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में आरोपित को भ्रूण का जैविक पिता पाया गया। अदालत ने अपने निर्णय में डीएनए रिपोर्ट को अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य मानते हुए कहा कि इससे अभियोजन की कहानी पूरी तरह पुष्ट होती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने विद्यालय के अभिलेखों और हाईस्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर पीड़िता की जन्मतिथि 23 मई 2007 स्वीकार की। घटना के समय उसकी आयु 16 वर्ष थी। न्यायालय ने कहा कि पीड़िता विधिक रूप से नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है। निर्णय में विशेष न्यायाधीश ने कहा कि आरोपित ने पारिवारिक रिश्ते और विश्वास का घोर दुरुपयोग करते हुए अपनी ही नाबालिग भांजी के साथ जघन्य अपराध किया। इस अपराध का पीड़िता के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। न्यायालय ने दोषी को तत्काल कारागार भेजने के आदेश दिए।








