बागेश्वर: जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बागेश्वर में एससीईआरटी उत्तराखंड के निर्देशन में ‘फसक-2026’ के अंतर्गत ‘हमारी धरोहर’ विषय पर दो दिवसीय विचार मंथन संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। यह संगोष्ठी 23 से 24 मार्च तक आयोजित की जा रही है। संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की लोक भाषाओं—कुमाऊँनी, गढ़वाली, जौनसारी और रं भाषा—को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप पाठ्यक्रम में शामिल करने की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श करना है। कार्यक्रम में विभिन्न जनपदों से आए शिक्षाविदों, भाषा विशेषज्ञों एवं साहित्यकारों ने भाग लेकर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं लोक भाषा विशेषज्ञ प्रो. डी.डी. पोखरिया ने कहा कि नई शिक्षा नीति के तहत लोक भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इससे स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण संभव हो सकेगा। गढ़वाली भाषा विशेषज्ञ बीना बेंजवाल ने अपने संबोधन में कहा कि गढ़वाली, कुमाऊँनी जैसी भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, जिन्हें शिक्षा से जोड़ना जरूरी है। डायट बागेश्वर के प्राचार्य चन्द्रपति अवस्थी ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि संस्थान भाषा संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है और यह संगोष्ठी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
भाषा उत्कृष्टता केंद्र के प्रभारी डॉ. कुन्दन सिंह रावत ने संगोष्ठी के उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लोक भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर एससीईआरटी उत्तराखंड, देहरादून से आए विशेषज्ञों ने राज्य की भाषाओं के संरक्षण के लिए चल रहे शैक्षिक कार्यक्रमों की जानकारी दी। संगोष्ठी में गढ़वाली, कुमाऊँनी एवं जौनसारी भाषाओं के विशेषज्ञों और साहित्यकारों ने भाग लिया, जिनमें रमाकांत बेंजवाल, खान सिंह चौहान, डॉ. सुरेंद्र आर्य, भगत राम पिलखवाल, हरीश टाकुलिया, दीपा नेगीवाल, किशोरी गयाल, इन्द्र सिंह चौहान सहित कई प्रमुख नाम शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध उद्घोषक हेमन्त बिष्ट द्वारा किया गया। इस दौरान डॉ. मनोज कुमार पांडेय, डॉ. सी.एस. जोशी, डॉ. संदीप कुमार जोशी, डॉ. अमीता बिष्ट, डॉ. भुवन चंद्र, डॉ. लीला जोशी, डॉ. हरीश चंद्र जोशी, कैलाश प्रकाश चंद्रेला सहित 80 से अधिक शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया।








