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सरयू तट पर उमड़ी आस्था, अष्टमी को पितरों के निमित्त हुआ पिंडदान,कर्नाटक और पुणे समेत देशभर से पहुंचे श्रद्धालु, मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुआ श्राद्ध और तर्पण

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बागेश्वर। पितृपक्ष की अष्टमी तिथि पर शनिवार को सरयू तट पर पितरों के प्रति श्रद्धा और आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह से ही सरयू-गोमती संगम पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। लोगों ने पवित्र सरयू में स्नान कर विधि-विधान से पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण किया। पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए।
पार्वण अथवा महालया श्राद्ध में अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार नवमी तिथि को मातृ श्राद्ध और अष्टमी को पितृ श्राद्ध के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। अष्टमी पर बड़ी संख्या में श्राद्ध होने के कारण नगर क्षेत्र के अधिकांश पुरोहित यजमानों को उनके घर जाने के बजाय सरयू तट पर ही श्राद्ध कर्म करा रहे हैं। इससे एक ओर जहां श्रद्धालुओं को संगम स्थल पर धार्मिक अनुष्ठान करने का अवसर मिल रहा है, वहीं पुरोहितों और यजमानों दोनों का समय भी बच रहा है। पुरोहित हेम चंद्र जोशी ने बताया कि काशी के बाद बागेश्वर के सरयू-गोमती संगम का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। उन्होंने कहा कि संगम नगरी बागेश्वर में सरयू-गोमती संगम पर किए जाने वाले धार्मिक कार्यों की विशेष महत्ता है। पितृपक्ष की अष्टमी पर यहां पिंडदान और श्राद्ध कराने के लिए जिले के साथ ही प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। शनिवार को कर्नाटक और पुणे से भी श्रद्धालु पिंडदान के लिए बागेश्वर पहुंचे। पुरोहित कैलाश उपाध्याय ने बताया कि सरयू के पावन जल में स्नान करने के बाद पिंडदान और श्राद्ध करने की विशेष धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालु यहां पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण और पिंडदान करते हैं। उन्होंने बताया कि बदलते समय के साथ अब अधिकांश यजमान घर की बजाय सरयू तट पर श्राद्ध कर्म कराना पसंद कर रहे हैं। अष्टमी के दिन सरयू तट पर जगह-जगह पुरोहितों के मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालुओं ने अपने पितरों को याद किया। पूरे तट पर सुबह से दोपहर तक आस्था और श्रद्धा का माहौल बना रहा।

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