उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न कोई नया नहीं है। टिहरी बाँध से लेकर चारधाम ऑल वेदर रोड और जोशीमठ भू-धंसाव तक कई घटनाओं ने यह सवाल उठाया है कि क्या हिमालयी राज्यों के लिए विकास का वही मॉडल उपयुक्त है जो मैदानी क्षेत्रों में अपनाया जाता है? जुलाई 2026 में ऋषिकेश–भानियावाला राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना ने इस बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।
लगभग ₹743 करोड़ की लागत वाली यह 20 किलोमीटर लंबी परियोजना भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य देहरादून, ऋषिकेश और जॉली ग्रांट एयरपोर्ट के बीच बेहतर संपर्क, चारधाम यात्रा के दौरान यातायात को सुगम बनाना तथा पर्यटन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है। लेकिन परियोजना के लिए 4,000 परिपक्व पेड़ों की कटाई प्रस्तावित थी। यह क्षेत्र शिवालिक एलीफेंट रिजर्व और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन गलियारे का हिस्सा है। इसी कारण स्थानीय नागरिकों, पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध किया। पेड़ों को गले लगाकर किए गए इस आंदोलन ने ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की याद ताज़ा कर दी। जनदबाव के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए सभी हितधारकों से पुनः संवाद की घोषणा की।
यह विवाद केवल एक सड़क परियोजना का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के विकास मॉडल का भी है। निस्संदेह, विकास आवश्यक है। बेहतर सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, रोजगार और आपदा के समय बेहतर परिवहन किसी भी राज्य की आवश्यकता हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या पूरे देश में विकास का एक ही मॉडल लागू किया जा सकता है? मैदानी क्षेत्रों और हिमालयी राज्यों की भौगोलिक एवं पारिस्थितिक परिस्थितियाँ अलग हैं। हिमालय विश्व के सबसे पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों में से एक है, जहाँ बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान और अनियोजित निर्माण भूस्खलन, भू-धंसाव, जल स्रोतों के क्षरण और जैव विविधता के नुकसान जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं।
इसीलिए उत्तराखंड के लिए विकास का मॉडल भी अलग होना चाहिए। यहाँ विकास का अर्थ केवल चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि सतत विकास होना चाहिए। उत्तराखंड के लिए विकास का ऐसा मॉडल अपनाया जाना चाहिए जो हिमालय की भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुरूप हो। विकास का उद्देश्य केवल सड़कें, पुल और भवन बनाना नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, आपदा जोखिम में कमी और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करना भी होना चाहिए। प्रत्येक परियोजना से पहले क्षेत्र की वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन और स्थानीय लोगों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। तभी विकास वास्तव में जनहितकारी, पर्यावरण-सम्मत और टिकाऊ कहा जा सकेगा।
इसी प्रकार, प्रत्येक बड़ी परियोजना में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि निर्णय का आधार होना चाहिए। ईआईए यह सुनिश्चित करता है कि परियोजना का जंगलों, वन्यजीवों, जल स्रोतों और स्थानीय आजीविका पर क्या प्रभाव पड़ेगा तथा उन प्रभावों को कम करने के लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं।
ऋषिकेश–भानियावाला परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि यह हाथियों के प्राकृतिक गलियारे और घने साल के जंगलों से होकर गुजरती है। एनएचएआई ने वन्यजीवों के लिए अंडरपास, एलिवेटेड वाइल्डलाइफ पैसेज, साउंड बैरियर और प्रतिपूरक वनीकरण जैसे उपायों का प्रस्ताव दिया है। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या सैकड़ों वर्षों में विकसित प्राकृतिक जंगलों की भरपाई केवल नए पौधे लगाकर की जा सकती है? वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जल, मिट्टी, जैव विविधता और स्थानीय जीवन का आधार हैं।
इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि उत्तराखंड के लोग विकास के विरोधी नहीं हैं। वे बेहतर सड़कें, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार चाहते हैं, लेकिन ऐसी कीमत पर नहीं जिसमें उनके जंगल, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो जाएँ। उनका विरोध विकास के नहीं, बल्कि असंतुलित विकास के विरुद्ध है।
आज उत्तराखंड को “सतत विकास के रूप में विकास” की आवश्यकता है, “आपदा के रूप में विकास” की नहीं। केदारनाथ आपदा, जोशीमठ भू-धंसाव और बढ़ते भूस्खलन बताते हैं कि हिमालय की वहन क्षमता की अनदेखी भविष्य के संकटों को जन्म दे सकती है। इसलिए राज्य के लिए एक पर्वतीय क्षेत्र-विशिष्ट विकास मॉडल अपनाने का समय आ गया है, जिसमें वैज्ञानिक योजना, स्वतंत्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए), स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण को समान महत्व मिले।
मुख्यमंत्री द्वारा वृक्ष कटान पर रोक और संवाद की पहल सकारात्मक कदम है, लेकिन वास्तविक सफलता तब होगी जब विकास की हर परियोजना जनसहमति, वैज्ञानिक प्रमाण और पर्यावरणीय न्याय पर आधारित होगी।
उत्तराखंड को विकास चाहिए, लेकिन उस कीमत पर नहीं जिसमें उसके जंगल, जैव विविधता और हिमालय की पारिस्थितिकी खतरे में पड़ जाए। राज्य का भविष्य ऐसे विकास मॉडल में है जहाँ सड़कें भी बनें और जंगल भी बचें—क्योंकि उत्तराखंड के लिए यही वास्तविक और टिकाऊ विकास होगा।
लेखक: डॉ. राकेश नेगी
सहायक प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय), श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड
नेहा
शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (केंद्रीय विश्वविद्यालय), श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड








