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बागेश्वर में उठी पर्वतीय क्षेत्रों को पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग, आंदोलन तेज करने की चेतावनी

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बागेश्वर। उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने सोमवार को आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों को भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोरदार तरीके से उठाई। इस दौरान प्रदेश उपाध्यक्ष भूपेंद्र कोरंगा, जिला पंचायत सदस्य विजया कोरंगा और जिला अध्यक्ष लोकेश पांडेय मौजूद रहे।
मोर्चा पदाधिकारियों ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप जनजातीय क्षेत्रों के अनुरूप है, इसलिए इन्हें संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासनकाल (1815 से 1874) के दौरान इन इलाकों को ‘गैर-विनियमित क्षेत्र’ घोषित कर विशेष प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई थी। बाद में इन्हें ‘बहिष्कृत’ और ‘अर्ध-बहिष्कृत’ क्षेत्रों की श्रेणी में रखा गया, जहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित होती थी।
प्रेस वार्ता में यह भी बताया गया कि प्रदेश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र है और अधिकांश लोग सीमांत किसान हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। साथ ही यहां की पारंपरिक संस्कृति, लोक पर्व, प्रकृति-पूजा और आजीविका के साधन जनजातीय जीवनशैली को दर्शाते हैं।
पदाधिकारियों ने कहा कि देश के अन्य पर्वतीय राज्यों के मूल निवासियों को जनजातीय दर्जा मिल चुका है, जबकि उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र अब तक इससे वंचित हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

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