बागेश्वर : स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी बागेश्वर जनपद के कांडा ब्लॉक का ऐतिहासिक गांव झुटौली आज विकास की मुख्यधारा से जुड़ नहीं पाया है। यह वही गांव है जहां के सपूत दिवंगत हर सिंह राठौर, आज़ाद हिंद फौज के साहसी सैनिक रहे, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत को लोहे के चने चबाने पर मजबूर किया था। लेकिन विडंबना यह है कि जिस मिट्टी ने देश को आज़ादी दिलाने में अपना योगदान दिया, वह आज तक सड़क, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। स्वतंत्रता सेनानी हर सिंह राठौर के 55 वर्षीय पुत्र हयात सिंह राठौर को ब्रैन हैमरेज होने पर ग्रामीणों ने डोली के सहारे झुटौली से कुचौली के समीप में सानीउडयार मलसूना सड़क तक लाए। जहां से उन्हें 108 से जिला अस्पताल लाया गया। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि हर सिंह राठौर उस दौर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की पुकार पर देश के लिए जान की बाज़ी लगाने वाले उन गिने-चुने सैनिकों में से एक थे जिन्होंने अंग्रेज़ी राज के खिलाफ मोर्चा खोला। झुटौली गांव की पहचान कभी उनके साहस और बलिदान से होती थी, लेकिन आज वहां की सड़कों पर सन्नाटा पसरा है। गांव तक पहुंचने के लिए आज भी दो से तीन किलोमीटर तक पैदल खड़ी चढ़ाई तय करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में रास्ते कीचड़ और फिसलन से भर जाते हैं, जिससे बीमारों को अस्पताल तक पहुँचाना तक मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे सड़क निर्माण की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की अनदेखी जारी है। कई बार अधिकारियों को ज्ञापन दिए गए, पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। झुटौली की युवा पीढ़ी बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में गांव छोड़ने को मजबूर है। गांव के आधे से अधिक घरों के दरवाजे बंद हैं पलायन अब झुटौली की सबसे बड़ी पहचान बन गया है। गांव के बुजुर्ग, राजेंद्र सिंह राठौर कहते हैं कि जिस धरती से आज़ादी के दीवाने निकले, उसी धरती पर अब विकास के नाम पर सन्नाटा है। अगर हर सिंह राठौर आज होते, तो इस हालात को देखकर ज़रूर व्यथित होते। स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी लोगों ने सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि नेता सिर्फ चुनावों के दौरान वादे करते हैं, लेकिन जीत के बाद गांव का नाम तक नहीं लेते। ग्राम प्रधान का कहना है कि उन्होंने कई बार विभागीय पत्राचार किया है, पर फाइलें दफ्तरों में अटकी हैं। यह विडंबना ही है कि जिस गांव ने आज़ाद हिंद फौज को सैनिक दिया, वहां अब बच्चों को स्कूल तक पहुँचने के लिए भी पहाड़ चढ़ना पड़ता है। देश के विकास के नक्शे में झुटौली जैसे गांव आज भी भूले-बिसरे कोनों में दर्ज हैं। झुटौली की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की खामोश गवाही है जो स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को सम्मान तो देता है, पर उनके गांवों तक विकास नहीं पहुँचा पाता।








