बागेश्वर : सरयू-गोमती के पावन संगम पर स्थिति बागेश्वर के ऐतिहासिक नुमाइश मैदान में उत्तरायणी मेले का आज विधिवत शुभारंभ प्रभारी मंत्री सौरभ बहुगुणा ने किया। शुभारंभ के अवसर पर उन्होंने मेले में लगाए गए विभिन्न विभागीय, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उत्पादों के स्टालों का निरीक्षण किया तथा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। आज रंगारंग झांकियों से उत्तरायणी मेले का आगाज हुवा।
इस दौरान प्रभारी मंत्री सौरभ बहुगुणा ने कहा कि उत्तरायणी मेला केवल एक पारंपरिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी लोक संस्कृति, परंपरा और सामाजिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह मेला कुमाऊँ की सांस्कृतिक पहचान को संजोए हुए है, जहां लोकगीत, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों का अनूठा संगम देखने को मिलता है। बहुगुणा ने कहा कि राज्य सरकार ऐसे ऐतिहासिक मेलों को संरक्षण देने और उन्हें और अधिक आकर्षक बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। उन्होंने स्थानीय कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और युवाओं से मेले का अधिक से अधिक लाभ उठाने का आह्वान किया। मेले के शुभारंभ अवसर पर बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, स्थानीय लोग और श्रद्धालु मौजूद रहे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियों ने माहौल को उत्सवमय बना दिया, वहीं स्टालों पर स्थानीय उत्पादों को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा गया।
वही विधायक बागेश्वर पार्वती दास,कपकोट सुरेश गढ़िया दर्जा राज्यमंत्री भूपेश उपाध्याय और शिव सिंह बिष्ट ने उत्तरायणी पर्व पर सभी को शुभकामनाएं दीं। गौरतलब है कि अंग्रेजों के काला कानून कुली बेगार का अंत उत्तरायणी के दौरान 14 जनवरी, 1921 में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में हुआ था। तब इसका प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में रहा। कुमाऊं मण्डल में इस कुप्रथा की कमान बद्री दत्त पाण्डे जी के हाथ में थी, वहीं गढ़वाल मण्डल में इसकी कमान अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के हाथों में थी। 13 जनवरी 1921 को संक्रान्ति के दिन एक बड़ी सभा हुई और 14 जनवरी को कुली बेगार के रजिस्टरों को सरयू में प्रवाहित कर कुली बेगार का अंत किया गया। इस काला कानून का खात्मा होने के बाद 28 जून 1929 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बागेश्वर की यात्रा की और नुमाइशखेत मैदान में सभा की और इस अहिंसक आंदोलन की सफलता पर लोगों के प्रति कृतज्ञता जता इसे रक्तहीन क्रांति की संज्ञा दी।








