बागेश्वर (कपकोट): कनलगढ़ घाटी में आई भीषण आपदा को कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने सरकार और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आपदा के बाद से कनलगढ़ घाटी आज भी सरकार की ओर टकटकी लगाए देख रही है, लेकिन राहत और पुनर्वास के नाम पर केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। ऐठानी ने बताया कि जगथाना–सुमटी–बैसानी–नान–चचई मोटर मार्ग आपदा में बुरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं। जगह-जगह छोटे पुल और पुलियां टूटकर गिर गई हैं, जिससे पूरे क्षेत्र का संपर्क लगभग कट गया है। हालात इतने भयावह हैं कि आंगनबाड़ी के नन्हे बच्चे और स्कूली छात्र-छात्राएं जान जोखिम में डालकर भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। आपदा ने घाटी की आजीविका की रीढ़ भी तोड़ दी है। मत्स्य पालन के तालाब बह गए, जिससे कई परिवारों का रोजगार पूरी तरह समाप्त हो चुका है। मेहनतकश ग्रामीण लगातार एक ही सवाल पूछ रहे हैं—“हमको मदद कब मिलेगी?” लेकिन इस सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं है।
ऊर्जा और पेयजल व्यवस्था भी पूरी तरह ध्वस्त है। UREDA विभाग के नान क्षेत्र स्थित हाइड्रो पावर हाउस की लाइनें टूट चुकी हैं, जिससे क्षेत्र अंधेरे में डूबा हुआ है। वहीं, पेयजल योजनाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं, लोगों को पीने के पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। सैकड़ों नालों के सैलाब में खेत-खलिहान बह चुके हैं, जिससे किसानों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया है।
सबसे गंभीर और शर्मनाक सच यह है कि आपदा राहत के नाम पर दिए गए चेक बाउंस हो रहे हैं। हरीश ऐठानी ने इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आपदा पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा बताया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने सब कुछ खो दिया, उनके हाथ में जब राहत का चेक पहुंचता है और वह भी बाउंस हो जाता है, तो यह सिस्टम की असंवेदनशीलता का सबसे क्रूर उदाहरण है। उन्होंने आरोप लगाया कि घाटी में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है, लेकिन सरकार और सत्ता में बैठे लोग शुद्ध लेन-देन, फोटो सेशन और अवसरवाद में व्यस्त हैं। भाजपा सरकार के लिए आपदा पीड़ितों का दर्द अब त्रासदी नहीं, बल्कि भाषण, तस्वीरें और कमीशन बटोरने का अवसर बनकर रह गया है। अंत में ऐठानी ने तीखा सवाल उठाया आपदा में अवसर ढूंढने वाली सरकार पीड़ितों को राहत कब देगी?”कनलगढ़ घाटी कराह रही है, लोग टूट चुके हैं, लेकिन सरकार अब भी मौन साधे बैठी है। यदि शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह आपदा केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता के रूप में भी इतिहास में दर्ज होगी।








