बागेश्वर : पहाड़ की पारंपरिक एपण कला को सहेजने और इसे नए रूप में लोगों तक पहुंचाने का काम महिलाएं कर रही हैं। वही लंबे समय से ऐपण कला से जुड़ी बागेश्वर की कंचन उपाध्याय इस बार ऐपण से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं। पारंपरिक डिजाइन और स्थानीय सामग्री से तैयार इन राखियों की लोगों के बीच काफी मांग है। कंचन उपाध्याय ने बताया कि वह लंबे समय से ऐपण कला के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। उनका प्रयास है कि उत्तराखंड की इस पारंपरिक कला को नए उत्पादों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने ऐपण कला से राखियां तैयार की हैं। इन राखियों को लोगों की ओर से काफी पसंद किया जा रहा है और मांग भी अच्छी है। उन्होंने बताया कि राखियां तैयार करने में कम से कम खर्च में बेहतर कार्य करने का प्रयास किया गया है। इसके लिए ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इससे लागत कम रखने के साथ स्थानीय संसाधनों का भी बेहतर उपयोग हो रहा है। कंचन का कहना है कि वह ऐपण कला को देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचाना चाहती हैं, ताकि उत्तराखंड की इस लोककला को व्यापक पहचान मिल सके। वही उनके साथ कार्य कर रहीं दीक्षा उपाध्याय ने कहा कि ऐपण कला हमारी संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा है। इस कला के माध्यम से राखियां तैयार कर वह अपनी संस्कृति को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्य से महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है और उनकी आर्थिकी मजबूत हो रही है। पारंपरिक कला को रोजगार से जोड़कर महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ऐपण कला से सजी राखियां केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति और परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बन रही हैं। महिलाओं की मेहनत और हुनर से तैयार ये राखियां स्थानीय कला को नई पहचान देने के साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने का काम भी कर रही हैं।








