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बदियाकोट का मां नन्दा भगवती मंदिर, आस्था, पौराणिक मान्यताओं और दानपुर की सांस्कृतिक विरासत का अनमोल धरोहर

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चौदह पट्टी दानपुर का सामूहिक शक्तिपीठ है आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर, आठ वर्ष में होती है आठ्यौं जात; सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

बागेश्वर। उत्तराखंड के मध्य हिमालय में मां भगवती नन्दा देवी के प्रति लोगों की आस्था सदियों पुरानी है। यहां मां नन्दा को कुलदेवी और आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता है। पहाड़ की धार्मिक परंपराओं, लोक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत में मां नन्दा का विशेष स्थान है। जनपद बागेश्वर के मल्ला दानपुर क्षेत्र के बदियाकोट में स्थित आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर इसी आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि चौदह पट्टी दानपुर की सामूहिक धार्मिक पहचान, पारंपरिक स्थापत्य कला और सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मल्ला दानपुर और तल्ला दानपुर में मां भगवती नन्दा के तीन प्रमुख सिद्धपीठ हैं। इनमें बदियाकोट स्थित आदिबद्री मां नन्दा पीठ, सरयू घाटी में बैछमधार सिद्धपीठ और पोथिंग स्थित मां नन्दा सिद्धपीठ शामिल हैं। इन मंदिरों में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी नन्दा अष्टमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। बदियाकोट का मंदिर अपनी धार्मिक मान्यता, ऐतिहासिक परंपराओं और व्यापक क्षेत्रीय जुड़ाव के कारण विशेष महत्व रखता है।

मृग से कन्या के रूप में दर्शन देने की लोक मान्यता

बदियाकोट स्थित मां नन्दा भगवती मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा क्षेत्र में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है। मान्यता के अनुसार, मां नन्दा भगवती ने चमोली के बंड क्षेत्र से आए छलि और बलि नामक दो भाइयों को कन्या के रूप में दर्शन दिए थे।

लोककथा के अनुसार, गढ़वाल क्षेत्र में मां नन्दा भगवती ने मृग का रूप धारण किया था। छलि और बलि नामक दोनों भाई उस मृग का पीछा करते हुए बागेश्वर जिले के बदियाकोट तक पहुंच गए। यहां एक छोटी पहाड़ी के समीप मां ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए और अपने दिव्य स्वरूप तथा घटनाक्रम के बारे में बताया।

कहा जाता है कि मां ने दोनों भाइयों को उस स्थान पर मंदिर बनाने और वहीं रहकर अपनी सेवा तथा भक्ति करने का आदेश दिया। इसके बाद वह अंतर्ध्यान हो गईं। इसी मान्यता के आधार पर बदियाकोट में मां भगवती के शक्तिपीठ की स्थापना मानी जाती है।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, आगे चलकर दोनों भाइयों के छह-छह पुत्र हुए। इनकी संतति बारह बदकोटी के नाम से प्रसिद्ध हुई। कालांतर में मां नन्दा के विभिन्न शक्तिपीठों में इनके वंशजों के पुजारी बनने की परंपरा विकसित हुई। इस प्रकार मंदिर की मान्यताएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक इतिहास और पारंपरिक पुजारी व्यवस्था से भी जुड़ी हुई हैं।

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शुम्भ-निशुम्भ के वध से जुड़ी मान्यताएं

बदियाकोट मंदिर का संबंध देवी शक्ति की उस परंपरा से भी जोड़ा जाता है, जिसमें मां भगवती द्वारा दैत्यों के संहार का वर्णन मिलता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां नन्दा भगवती ने मंदिर के समीप निशुम्भ नामक दैत्य का वध किया था, जबकि शुम्भ का वध सुमगढ़ नामक स्थान पर किया गया था।

इसी मान्यता के कारण इस क्षेत्र को प्राचीन समय में वध कोट कहा जाता था। लोक परंपरा में देवी द्वारा दुष्ट शक्तियों पर विजय की स्मृति इस क्षेत्र के धार्मिक नामों और मान्यताओं में दिखाई देती है। हालांकि, इन स्थानीय कथाओं के ऐतिहासिक और पुराणिक संदर्भों की पुष्टि के लिए संबंधित प्राचीन ग्रंथों तथा ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है।

आठ वर्ष में आठ्यौं, चार वर्ष में घर-आठ्यौं

आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में आठ्यौं जात का विशेष स्थान है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, मंदिर में प्रत्येक आठ वर्ष के अंतराल पर आठ्यौं यानी बड़ी जात का आयोजन किया जाता है। वहीं, प्रत्येक चार वर्ष में घर-आठ्यौं के रूप में छोटी जात आयोजित होती है। बारह वर्ष के अंतराल पर नन्दा जात अथवा माल जातरा की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

इन धार्मिक आयोजनों की तैयारी लंबे समय पहले शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार, दानपुर के दाणू देवता विभिन्न क्षेत्रों में जाते हैं। चार पट्टी दानपुर के अतिरिक्त जोहार और मुनस्यारी क्षेत्र तक भी इस परंपरा का विस्तार बताया जाता है। वहां के लोग मां भगवती को चढ़ावा अर्पित करते हैं और उन्हें आठ्यौं में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया जाता है।

आठ्यौं जात के दौरान देव-डांगरों द्वारा तीन महीने तक व्रत रखने की परंपरा बताई जाती है। इसके बाद नन्दा कुण्ड और सुंदरढूंगा क्षेत्र में पूजा-अर्चना की जाती है तथा नन्दा अष्टमी के अवसर पर वापसी होती है। यह परंपरा मां नन्दा के प्रति श्रद्धा के साथ हिमालयी धार्मिक यात्राओं और स्थानीय लोक संस्कृति के गहरे संबंध को भी दर्शाती है।

मंदिर में मां नन्दा भगवती की पूजा के साथ उनके धर्मभाई माने जाने वाले लाटू देवता और तिब्बती हूंण देवता की पूजा-अर्चना भी की जाती है। गढ़वाल से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूजा का समय निर्धारित होने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

अनेक गांवों और क्षेत्रों को जोड़ता है मंदिर

बदियाकोट का मां नन्दा भगवती मंदिर दानपुर क्षेत्र के अनेक गांवों और समुदायों को धार्मिक सूत्र में बांधता है। परंपरा के अनुसार, दोफाड़ क्षेत्र के कालाकोटी, पेठी के देवली, सापुली और अन्य स्थानों में बसे दानू समुदाय के लोग मंदिर की पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त जोहार-मुनस्यारी और पिंडर घाटी के खाती, वाछम, सोराग, तीख, डौला, किलपारा, कुवारी, कालौ, बोराचक और झारकोट सहित अनेक गांवों के लोग भी मंदिर से जुड़े हैं। गढ़वाल क्षेत्र से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

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मंदिर में पूजा के अवसर पर श्रद्धालु अपनी परंपराओं के अनुसार श्रमदान करते हैं तथा पूजा सामग्री और आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं। यही कारण है कि इस सिद्धपीठ को अनेकता में एकता और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता है।

यहां आने वाले लोगों के लिए मां नन्दा की पूजा केवल व्यक्तिगत धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की परंपराओं को जीवित रखने और सामुदायिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर भी है।

ब्रिटिश काल में मंदिर को मिली थी गूंठ

मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा ब्रिटिश काल में दी गई गूंठ से संबंधित है। स्थानीय विवरणों के अनुसार, उस समय बदियाकोट भगवती मंदिर को गूंठ प्रदान की गई थी। यह भी कहा जाता है कि पिंडारी क्षेत्र में पशु चुगान से प्राप्त कर का एक हिस्सा मंदिर को भेंट किया जाता था।

इस प्रकार मंदिर की व्यवस्था केवल श्रद्धालुओं के सहयोग पर आधारित नहीं रही, बल्कि ऐतिहासिक समय में इसके लिए अलग प्रकार की व्यवस्थाएं भी रही होंगी। गूंठ और पशु चुगान कर से जुड़ी इन परंपराओं के दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध होने पर मंदिर के सामाजिक और आर्थिक इतिहास को और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला की अनूठी पहचान

आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर का महत्व इसकी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसकी पारंपरिक वास्तुकला में भी निहित है। मंदिर का जीर्णोद्धार कर इसे भव्य स्वरूप दिया गया है। इसके निर्माण में हिमालयी स्थापत्य परंपरा को ध्यान में रखा गया, जिससे मंदिर की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का प्रयास किया गया।

मंदिर परिसर में पुराकालीन स्थापत्य शैली से प्रेरित सुंदर खोली का निर्माण किया गया है, जो इसकी भव्यता को बढ़ाता है। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल की गई पारंपरिक सामग्री और कारीगरी क्षेत्र की पुरानी शिल्प परंपराओं की याद दिलाती है।

स्थानीय विवरण के अनुसार, मंदिर के भव्य द्वार के लिए देवदार की लकड़ी कौसानी से लाई गई, जबकि सफेद पत्थर सोर क्षेत्र से आया। पुराने समय में मंदिर को थौरुप कहा जाता था, क्योंकि इसकी छत लकड़ी के तख्तों से बनाई जाती थी। इस प्रकार मंदिर का वर्तमान स्वरूप पुराने निर्माण की परंपरा और नए जीर्णोद्धार के प्रयासों का मेल प्रस्तुत करता है।

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जीर्णोद्धार में ग्रामीणों ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

मंदिर के नवीनीकरण और निर्माण कार्य में मल्ला दानपुर के कई गांवों के लोगों ने सहयोग दिया। खाती, वाछम, सोराग, तीख, डौला, किलपारा, कुवारी, कालौ, बोराचक और झारकोट सहित अनेक गांवों के ग्रामीणों ने श्रमदान और अन्य माध्यमों से योगदान दिया। जनपद बागेश्वर के अन्य क्षेत्रों तथा बाहर रहने वाले लोगों ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग किया।

सोराग गांव की भूमिका इस परंपरा में विशेष मानी जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सोराग को मां भगवती का मायका माना जाता है। परंपरा के तहत सोराग के ग्रामीणों को मंदिर की छत के लिए धूरा का लट्ठा ले जाने का अधिकार प्राप्त है। ग्रामीणों ने अपनी मेहनत से इस जिम्मेदारी को निभाया।

इसके अतिरिक्त पेठी के देवली, सापुली के दाणू, खाती, वाछम, तीख, डौला, किलपारा, कुवारी, बोरा, समडर, भराकाने और चमोली क्षेत्र के लोगों ने भी अपनी परंपराओं के अनुसार मंदिर से जुड़े कार्यों में भागीदारी निभाई। यह सामूहिक सहयोग दर्शाता है कि मंदिर की देखभाल और संरक्षण स्थानीय समाज के लिए धार्मिक दायित्व के साथ-साथ सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।

बागेश्वर से करीब 58 किलोमीटर दूर है मंदिर

आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर बागेश्वर जिला मुख्यालय से लगभग 58 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यहां पहुंचने के लिए छोटे वाहन उपलब्ध रहते हैं। दानपुर क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जानने के इच्छुक श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर महत्वपूर्ण स्थल है।

मंदिर से जुड़ी लोककथाएं, जात की परंपराएं, ग्रामीणों का सामूहिक योगदान और पारंपरिक स्थापत्य कला इसे क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर बनाते हैं।

आस्था के साथ विरासत के संरक्षण का भी केंद्र

बदियाकोट का आदिबद्री मां नन्दा भगवती मंदिर दानपुर की उस सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें धर्म, लोककथा, सामुदायिक सहभागिता और पारंपरिक शिल्प एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहां की आठ्यौं जात, विभिन्न गांवों की सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा पद्धतियां इस विरासत को जीवंत बनाए रखती हैं।

मंदिर की पहचान केवल उसकी धार्मिक मान्यता से नहीं, बल्कि उन लोगों के सामूहिक प्रयासों से भी बनी है, जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसकी परंपराओं को संजोया और इसके संरक्षण में योगदान दिया। ऐसे स्थलों का इतिहास और उनसे जुड़ी लोक परंपराएं उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। बदियाकोट का यह सिद्धपीठ आज भी मां नन्दा के प्रति श्रद्धा और दानपुर की सामूहिक पहचान का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

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